पटना/दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव में NDA की शानदार जीत ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को भाजपा अध्यक्ष पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभार दिया है। पार्टी नेताओं का मानना है कि चुनाव अभियान के दौरान उनके सूक्ष्म प्रबंधन, संगठन क्षमता और जातिगत रूप से जटिल बिहार की राजनीति में कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की उनकी भूमिका जीत की बड़ी वजह रही।
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सूत्र बताते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान ने चुनाव प्रचार के दौरान
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बागी नेताओं से समन्वय स्थापित किया,
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संगठन की दिशा तय की,
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और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इसी कारण भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसे संगठनात्मक मजबूती और रणनीतिक नेतृत्व का परिणाम माना जा रहा है।
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भाजपा और आरएसएस के बीच नए राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर चल रही लंबी चर्चा अब पटरी पर आती दिख रही है। सूत्रों का कहना है कि बिहार में मिली सफलता ने स्थिति को काफी हद तक साफ किया है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक केंद्रीय मंत्री ने कहा,
“मोदीजी अब आरएसएस को अपनी पसंद के भाजपा अध्यक्ष को मंजूरी देने के लिए राजी करने में सफल हो सकते हैं।”
यह बयान संकेत देता है कि धर्मेंद्र प्रधान का नाम शीर्ष स्तर पर सबसे पसंदीदा विकल्प बन चुका है।
क्यों आगे हैं धर्मेंद्र प्रधान?
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संगठन और चुनाव प्रबंधन का लंबा अनुभव
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विभिन्न राज्यों में सफल चुनावी रणनीतिक भूमिका
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केंद्रीय नेतृत्व के साथ मजबूत तालमेल
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जटिल राजनीतिक समीकरणों को साधने की क्षमता
बिहार जीत के बाद पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हुई है कि भाजपा को अब ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है, जो संगठन और चुनाव—दोनों में बराबर दक्षता रखता हो।

