India-Pakistan , नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान ने एक बार फिर नए साल की शुरुआत में एक-दूसरे को अपने-अपने परमाणु ठिकानों और प्रतिष्ठानों की सूची सौंप दी है। यह प्रक्रिया दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही एक महत्वपूर्ण विश्वास-निर्माण व्यवस्था (Confidence Building Measure – CBM) का हिस्सा है, जिसे हर साल 1 जनवरी को दोहराया जाता है। भले ही दोनों देशों के रिश्तों में कई बार तनाव रहा हो, लेकिन यह परंपरा दशकों से बिना किसी रुकावट के जारी है।

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क्या है परमाणु ठिकानों की सूची साझा करने की प्रक्रिया?

भारत और पाकिस्तान वर्ष 1988 में हुए परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले न करने के समझौते (Agreement on the Prohibition of Attack against Nuclear Installations and Facilities) के तहत हर साल यह सूची साझा करते हैं। यह समझौता 1991 में लागू हुआ था। इसके अनुसार, दोनों देश एक-दूसरे को उन सभी परमाणु ठिकानों की जानकारी देते हैं, जिनमें परमाणु ऊर्जा संयंत्र, अनुसंधान रिएक्टर, ईंधन निर्माण या प्रोसेसिंग से जुड़े प्रतिष्ठान शामिल होते हैं।

क्यों जरूरी है हर साल यह कदम?

इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी स्थिति में दोनों देश एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना न बनाएं। सूची साझा करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि किन स्थानों को किसी भी सैन्य कार्रवाई से अलग रखा जाएगा। इससे युद्ध या तनाव की स्थिति में गलतफहमी और अनजाने हमले की आशंका कम होती है।

तनाव के बीच भी जारी रही परंपरा

भारत और पाकिस्तान के संबंध कई मुद्दों—जैसे सीमा विवाद, आतंकवाद और कूटनीतिक तनाव—के चलते अक्सर चुनौतीपूर्ण रहे हैं। इसके बावजूद, यह परमाणु सूची साझा करने की प्रक्रिया दोनों देशों के बीच एक न्यूनतम लेकिन महत्वपूर्ण संवाद का माध्यम बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दक्षिण एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में परमाणु जोखिम को कम करने में सहायक है।

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Alok Kumar Srivastava
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