राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने अपने संबोधन में आधुनिकता के साथ-साथ अपनी भारतीय पहचान को बनाए रखने पर जोर दिया। भागवत ने कहा कि आज की तेजी से बदलती दुनिया में भी हमें अपने घरों में अपनी भाषा, परंपरा, वेशभूषा और संस्कृति को जीवित रखना होगा।

आतंकी अलर्ट के बाद राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में बदलाव, सुरक्षा कड़ी

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाना

अपने भाषण में मोहन भागवत ने शिक्षा को लेकर एक गहरी बात कही। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल जानकारी प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को सुसंस्कृत और चरित्रवान बनाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि तकनीक और आधुनिकता शिक्षा के विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनका सही इस्तेमाल हमारी परंपराओं और संस्कृति को और मजबूत कर सकता है।

नई शिक्षा नीति सही दिशा में एक कदम

भागवत ने केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (NEP) की सराहना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति सही दिशा में एक कदम है, क्योंकि इसमें ‘पंचकोषीय शिक्षा’ के प्रावधान शामिल हैं। ‘पंचकोषीय शिक्षा’ एक ऐसी प्रणाली है, जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे एक समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

आरएसएस प्रमुख का यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब देश अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आधुनिक विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। उनका यह संदेश संघ के शताब्दी वर्ष को एक नए दिशा-निर्देश की ओर ले जाता है, जिसमें परंपरा और प्रगति को एक साथ लेकर चलने की बात कही गई है।

Share.

Alok Kumar Srivastava
Chief Editor

Address :    104, Bharsar, District – Ghazipur, Uttar Pradesh – 233300

Mobile        +91-98388 99305
Email        prabhatdarshan25@gmail.com

March 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031  

© 2025 prabhatdarshan.com 

Exit mobile version