नई दिल्ली — राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किला के पास हुंडई i20 कार में हुए धमाके को पहला आत्मघाती (सुसाइड) हमला करार दिया है। एजेंसी ने इस बात की भी पुष्टि की है कि कार चला रहा डॉ. उमर उल नबी वही आत्मघाती हमलावर था। यह पुष्टि घटनास्थल से मिले फॉरेंसिक और डीएनए सबूतों के आधार पर की गई है।

 हमले की तह तक — NIA की जांच में प्रमुख बिंदु

  1. आत्मघाती हमला (फिदायीन)
    NIA के अनुसार, हमले में इस्तेमाल की गई कार VBIED (Vehicle-Borne Improvised Explosive Device) थी, और उसे जानबूझकर ड्राइव करके धमाका करवाया गया।

  2. ड्राइवर की पहचान
    फॉरेंसिक जांच ने यह साबित किया है कि धमाके के समय कार चला रहा व्यक्ति डॉ. उमर उल नबी ही था।

    • NIA का कहना है कि उमर पुलवामा (जम्मू-कश्मीर) का निवासी था और अल-फलाह यूनिवर्सिटी (फरीदाबाद, हरियाणा) में असिस्टेंट प्रोफेसर थे।

    • उनके अन्य वाहन को भी जब्त कर उसकी गहन पड़ताल की जा रही है।

  3. साजिश में सहयोगी गिरफ्तार
    NIA ने आमिर राशिद अली नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसे तोहफूपर कहा जाता है। आरोप है कि आमिर ने कार खरीदी थी और उमर के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया।

  4. जूते में छिपा ट्रिगर?
    एक सबसे चौंकाने वाली खोज यह है कि कार के अंदर एक संदिग्ध जूता मिला है, जिसमे धातु का घटक (मैटॉप्य)(metal component) हो सकता है, जिसे ट्रिगर के रूप में इस्तेमाल किया गया हो।

    • जूते के इस भाग की जांच जारी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह वास्तव में धमाके को ट्रिगर करने का हिस्सा था या नहीं।

    • इसके अलावा, जांच में यह संभावना भी जताई जा रही है कि विस्फोट में TATP जैसे संवेदनशील विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया हो — यह “Mother of Satan” के नाम से भी जाना जाता है।

  5. श्वेत कॉलर आतंक नेटवर्क
    जांच के दौरान सामने आया है कि यह हमला एक “white-collar terror module” का हिस्सा हो सकता है, जिसमें डॉक्टरों की भूमिका निहित है।

  6. गवाह और सबूत

    • NIA ने अब तक कम-से-कम 73 गवाहों के बयान दर्ज किए हैं, जिनमें जेह घायलों का भी समावेश है।

    • अन्य कारों की भी जांच की जा रही है — एजेंसी यह देख रही है कि क्या अन्य वाहन भी IED के रूप में तैयार किए गए थे।

संभावित महत्व और आगे की चुनौतियाँ

  • यह हमला न सिर्फ दिल्ली में पहला आधिकारिक सुसाइड कार बमिंग हो सकता है, बल्कि “जूता-बम” की बात नए खतरे की तरफ इशारा करती है — क्योंकि ऐसा तरीका अब तक कम ही देखा गया है।

  • सुरक्षा एजेंसाओं और जांचकर्ताओं के लिए यह बड़ा चैलेंज है कि कैसे इस तरह के मॉड्यूल को पहले से पहचाना जाए और रोका जाए।

  • ट्रिगर की पुष्टि और विस्फोटक पदार्थों की सटीक पहचान आगे की कार्रवाई में अहम भूमिका निभाएगी — क्योंकि इससे यह स्पष्ट होगा कि हमलावर ने कितनी तकनीकी तैयारी की थी।

  • साथ ही, ऐसे मामलों में राजनीतिक और सुरक्षा नीतिगत मायने भी उठते हैं — विशेष रूप से आतंकवाद-रोधी रणनीतियों, आईईडी (Improvised Explosive Devices) पर नजर रखने, और वैज्ञानिक-पेशेवर वर्ग में हो रही कट्टरता की जांच में।

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Alok Kumar Srivastava
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