नई दिल्ली। तमिलनाडु में मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन को लेकर विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य सरकार ने अंडरग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में NEET की अनिवार्यता खत्म करने के लिए बनाए गए बिल पर राष्ट्रपति द्वारा लगाई गई रोक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। अब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक प्रश्न के रूप में सामने आया है।

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सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश – पहले आएगा संविधान पीठ का फैसला

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की दो-judge पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि राज्य सरकार की याचिका पर आगे की सुनवाई संविधान पीठ के निर्णय के बाद ही होगी।

पीठ ने टिप्पणी की:
“आपको राष्ट्रपति संदर्भ के परिणाम का इंतजार करना होगा। मुश्किल से चार सप्ताह का इंतजार है।”

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि संविधान पीठ 21 नवंबर तक इस संदर्भ पर फैसला दे देगी, क्योंकि उसी दिन CJI गवई सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर को आरक्षित किया था फैसला

राष्ट्रपति संदर्भ से जुड़ा यह मामला पहले से सुनवाई में है। 11 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस संदर्भ में मुख्य प्रश्न यह है कि:
क्या संवैधानिक अदालतें राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा द्वारा पारित बिलों पर मंजूरी देने के लिए समय सीमा तय कर सकती हैं?

यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि कई राज्यों में राज्यपाल द्वारा बिलों को लंबित रखने को लेकर लंबे समय से विवाद जारी है।

सिंघवी ने दी दलील—राज्यपाल को संविधान की सीमाओं का पालन करना चाहिए

तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि:

  • राज्यपाल मंत्रिपरिषद की ‘सहायता और सलाह’ के अनुसार ही कार्य करने के लिए बाध्य हैं।

  • वे इस सलाह के बाद बिल को राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते, जब तक कि संविधान में ऐसा प्रावधान स्पष्ट न हो।

  • राज्यपाल के पास “स्वतंत्र शक्ति” नहीं है कि वह निर्वाचित सरकार की इच्छा के विपरीत जाकर बिल रोक दें।

NEET बिल विवाद की पृष्ठभूमि

  • तमिलनाडु सरकार ने NEET को हटाकर स्कूल शिक्षा आधारित मेडिकल एडमिशन सिस्टम लागू करने के लिए एक बिल पारित किया था।

  • विपक्ष और विशेषज्ञों के अनुसार, NEET ग्रामीण व वंचित छात्रों के लिए बाधा उत्पन्न करता है।

  • राष्ट्रपति ने इस बिल को मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।

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Alok Kumar Srivastava
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